Monday, 7 December 2015

प्रकृति

होगी तब ही संतुष्टि
होगी जब एक बात की पुष्टि
कैसे करती है समन्वय ये सृष्टि
कैसे सब पर समान इसकी दृष्टि
कैसे करती ये जरूरतों की तुष्टि
कैसे करती ये सब पर समान वृष्टि
क्या इसी का नाम है प्रकृति 
क्यों हो गयी इसकी दुर्गति
क्या यही है हमारी संस्कृति

उत्तर कुछ यूँ मिला

क्योंकि ये है दया की मूर्ति
करती है सबकी पूर्ति
कभी न द्वेष भाव रखती
बड़ी उदार इसकी प्रवृत्ति
अपना सब कुछ ये दे देती
स्वयं में जीवन को धारती
मानव को माँ सा पालती
गोद में अपनी खिलाती
ऑक्सीजन देती पानी देती
और न जाने क्या-क्या देती
अपना वारिस इसे बनाती
इसी का नाम है प्रकृति
पर मानव की बात निराली
इसकी सोच में है खराबी
मानसिकता में आ गई विकृति
मानव की बिगड़ गई प्रवृत्ति
बढ़ी संसाधनों के दोहन की आवृत्ति
मानव को प्यारी उसकी संपत्ति
नहीं प्रकृति की बर्बादी से आपत्ति
इसीलिए प्रकृति पर आई ये विपत्ति
हो गई इसीलिए प्रकृति की ये स्थिति

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