Thursday, 3 December 2015

सपनों की कीमत अपने


अपनों की इस दुनिया में कोई न अपना सा है
सपनों की इस दुनिया में हर सपना सपना सा है
अपना अब सपना सा है सपना अब अपना सा है
अपनों से प्यार नहीं उतना जितना प्यार है सपनों से
अपनों के लिए मैं नहीं बिका, बिक गया मैं सपनों के लिए
और कीमत मिली मुझे बस धन-दौलत, गाड़ी, बंगला
आज पास बहुत कुछ है पर साथ नहीं है अपनों का
रह रहकर याद वही आता है वह साथ था जो अपनों का
सोचा था ये सब संतुष्टि देगें अपनों की कमी न होने देगें
पर अब जाना ये सबके सब न तुष्टि देगें न सुख देगें
अब महसूस किया कि सपना तो सपना ही होता है
अपनों का साथ कहाँ सभी को आसानी से नसीब होता है
पीछा करते करते सपनों का मैं आ पहुँचा हूँ मंज़िल पर
ये मंजिल शायद खड़ी हुई है अपनों के अरमानों पर
सपने तो मेरी झोली में हैं पर अपने हो गये हैं दूर बहुत
हँसी-ठिठोली घूमना-फिरना अपनों संग याद आता है बहुत
अपनों की कीमत सपने थे सपनों की कीमत अपने थे
सपने न अपने ही हुए पर अपने अब सपने से हुए
इन सपनों की चकाचौंध में हम न जाने कहाँ गुम से हुए
सपनों की भीड़ बहुत है लेकिन मैं बिल्कुल अकेला हूँ
शायद मैं सपनों के संग अपनों सा बनकर खेला हूँ
अब हम भी न हम ही से रहे फिर दूसरों से क्यों आशा ही करें

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